हिन्दी सप्त-श्लोकी चण्डी-पाठ
हिन्दी सप्त-श्लोकी चण्डी-पाठ

।। श्री शिव बोले ।।
।। पूर्व पीठिका ।।
तुम हो देवी ! भक्ति-सुलभ, सब कार्य कलापों की स्वामिनि हो ।
बोलो, कलि में कार्य-सिद्धि-हित, जन को क्या उपाय करना है ?
।। श्रीदेवी बोलीं ।।
कलियुग का उत्तम-तम साधन, श्रवण करें हे देव ! ध्यान धर ।
बतलाती मैं स्नेह-सहित, केवल माता की स्तुति करना है ।।
।। ध्यान ।।
जिनके श्री अंगों का तेजस विद्युत-सा है -
वह जो केहरि के कन्धे पर बैठीं, भीषण-सी लगती है ।
गदा, ढाल, धनु जिनके कर-कमलों में शोभित -
तर्जनि मुद्रा, पाश, चक्र, जो खड्ग, बाण धारण करती हैं ।।
कन्याएँ ले खड्ग-ढाल जिनकी सेवा-रत -
जिनके मस्तक पर शशि से उज्ज्वल किरीट शोभा पाता है ।
उन्हीं त्रि-नेत्रा अग्नि-स्वरुपा दुर्गा का मैं -
करता सादर ध्यान, मुझे उनका यह दिव्य रुप भाता है ।।
।। सात श्लोक ।।
ज्ञानी लोगों के भी चित्त को, बल-पूर्वक कर्षित करती ।
वह भगवती महा-माया ही, मोह हेतु है ला देती ।। १
दुर्गे ! याद किए से तुम तो, जीवों का भय हरती हो,
करते हैं यदि स्वस्थ याद तो, शुभ मति उनको देती हो ।
दारिद्र-दुःख हरने वाली ! कौन तुम्हारे है अतिरिक्त ,
पर-उपकार हेतु रत जग में, दयार्द्र रहता है तव चित्त ।। २
सभी मंगलों की शिव-रुपा ! गौरी ! शिवा ! शरणदा !
नमस्कार तुमको नारायणि ! त्रि-नयना ! हे सिद्धि-प्रदा ।। ३
शरणागत का दैन्य-दुःख से, परित्राण करने वाली ।
प्रणमन देवि ! तुम्हें नारायणि ! सबका दुख हरने वाली ।। ४
सर्व-शक्ति-अन्विता देवि हे ! सर्व स्वरुपा ! सर्वेशा ।
नमस्कार तुमको हे दुर्गा ! भय से रक्षा करो महेशा ।। ५
सारे रोग नाश हो करतीं, जब तुम होती हो सन्तुष्ट,
सकल अभीष्ट ध्वंस कर देतीं, हो जातीं यदि कुछ भी रुष्ट ।
है लेते तेरा जो आश्रय, आती उनके विपद न पास ।
हो जाते आश्रय-निकेत वे, देते सबको सदा सुपास ।। ६
नाश हमारे रिपुओं का कर, सब त्रिलोक-बाधा की दूर ।
हे सर्वेश्वरि ! यह सब फिर भी, करना होगा काम जरुर ।। ७
।। फल-श्रुति ।।
यह स्तोत्र देवी-प्रदत्त, वैभव-कुल-दायक, सब प्रकार से रक्षा करता ।
परम गुह्य यह, पाठ कराने, पठन-श्रवण द्वारा, त्रिलोक की विजय दिलाता ।।
।। क्षमा-प्रार्थना ।।
तेरी कृपा करे यह वन्दन सफल, पूर्ण मम हे सर्वेश्वरि !
मन्त्र-हीन है, भक्ति-हीन यह, क्रिया-हीन यद्यपि देवश्वरि ! ।।
।। पाठ-समर्पण ।।
यह जप तुझे समर्पित सादर, परम गुह्य-रुपिणि माँ ! मेरा ।
सिद्धि प्रदान करे देवी ! वह दिव्य प्रसाद महेश्वरि ! तेरा ।।

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माँ बगलामुखी
माँ बगलामुखी
हेम रुचिर पट पीत सरोवर, प्रकटित धन्य स्व-नाम ।
मन्त्र-मयी बगलामुखि वैष्णवि, शक्ति सबल बल-धाम ।।
ऊपर गगन हकार धराधर, धरणी बीज ललाम ।
बिन्दु-मयी बगला पीठेश्वरि, ह्रींकारेश्वरि-धाम ।।
बीज-मयी हरि-शक्ति-मयी ह्लीं, मन्त्र-मयी बल-धाम ।
नष्ट करो अरि-व्यूह महा, बगलमुखि मातु प्रणाम ।।
दुश्मन दुष्ट मुखर, मुख-वाणी, स्तम्भित कर-पद-चाल ।
कील करो रसना अरि जिह्वा, बुद्धि करो अरि ब्याल ।।
प्रीति पराग-पगी वसुधा, नभ विष्णु-प्रिया रति-काम ।
सृष्टि-मयी मधु-गन्ध-मयी, भगवन्ति महा-छवि-धाम ।।
गन्ध-पुष्प-मधु-धूप-दीपिका, सरस द्रव्य मधु-पान ।
पूजन-तर्पण-नमन भाव-मय, स्वाहा सहित प्रणाम ।।
क्रोधिनि स्तम्भिनि चँवर-धारिणी, बगलामुखी प्रणाम ।
जय-जय उड्डियान जालन्धर, कामद-गिरि गुरु-धाम ।।
जयति अनन्त-नाथ गुरु जय-जय, श्रीकण्ठ-नाथ गुरु नाह ।
नाथ-शिरोमणि दत्तात्रेय गुरु, शत-शत बार प्रणाम ।।
भगवति षष्टि महा-बगले, सुभगे शत-कोटि प्रणाम ।
जय-जय भय-सर्पिणि, भग-वाहिनि, भग-मालिनि सुख-धाम ।।
भगवति भग शुद्धा भग-पत्नी, जय-जय षष्टि प्रणाम ।
जय भव-सृष्टि योनि-भग-धारिणि, पालिनि-स्थिति-विश्राम ।।
अष्ट-कमल-दल-वासिनि ब्राह्मणि, माहेश्वरि प्रणाम ।
जय-जय कौमारी जय वैष्णवी, वाराही बल-धाम ।।
इन्द्राणी जय चामुण्डा जय, जय लक्ष्मी, जय धाम ।
अष्ट-मातृका संग कमल-दल-वासिनि मातु-प्रणाम ।।
जयति जया-विजया अजिता जय, अपराजिता प्रणाम ।
जृम्भिणि स्तम्भिनि मोहिनि जय-जय, आकर्षिणि छवि-धाम ।।
जय असितांग संग रुरु भैरव, चण्ड-क्रोध परिवार ।
उन्मत्त मस्त कपालि माल-धर, भीषणेश संहार ।।
जय षोडश-दल-वासिनि बगला, स्वाहा सहित प्रणाम ।
स्तम्भिनि जृम्भिणि मोहिनि माते ! चञ्चलादि गुण-धाम ।।
माता स्वाहा सहित प्रणाम ।।
जय अचला, वश्या, कलिका जय, कल्मषादि तव नाम ।
जय धात्री कल्पान्ता माता, आकर्षिणि अभिराम ।।
माता स्वाहा सहित प्रणाम ।।
शाकिनि जयति अष्ट-गन्धा जय, भोगेच्छा कृत-काम ।
जयति भाविका भाव-मयी माँ, बगलामुखी प्रणाम ।।
जय-जय ह्लींकारेश्वरि अर्पित, कनक-पीठ अभिराम ।
पीता पद्म-पराग-मालिका, भूषण भव्य ललाम ।।
पीताम्बर-परिधान-भूषिता, सुधा-सिन्धु मणि-धाम ।
जयति जयति जय ह्लींकारेश्वरि, बगलामुखि प्रणाम ।।
अरि रसना मुग्दर कर राजित, उग्रवती बल-धाम ।
वात-क्षोभ-तूफान शान्त हो, शमित दुखद परिणाम ।।
हरि सकल अरि, ब्याल नष्ट हों, दुश्मन दुष्ट तमाम ।
कर स्तम्भित मुख-वाच-चाल-पद, मिटें शत्रु अविराम ।।
कील करो रसना अरियों की, बुद्धि हरो अविराम ।
दुश्मन दुष्ट विनष्ट-त्रस्त हों, बने जगत् सुख-धाम ।।
गन्ध-पुष्प-मधू-धूप-दीपिका, सरस द्रव्य मधु-पान ।
पूजन-तर्पण-नमन भाव-मय, स्वाहा सहित प्रणाम ।।
स्वर्ण-शिखर रवि-हेम-किरण नव, कनक-पीठमणि-धाम ।
अर्पित पीत पुनीत पद्म-सारि, बगलामुखी प्रणाम ।
जयति जयति जय ह्लींकारेश्वरि ! प्रीति कमल निष्काम ।।
पद्म-राग अम्लान समर्पित, करत नमन बलराम ।।
माता स्वाहा सहित प्रणाम ।।
-श्री बलराम दुबे

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अघोर शाबर मन्त्र
Aghor Shabar Mantra
अघोर शाबर मन्त्र
मन्त्रः-
“ॐ नमो आदेश गुरु । घोर-घोर, काजी की कुरान घोर, मुल्ला की बांग घोर, रेगर की कुण्ड घोर, धोबी की चूण्ड घोर, पीपल का पान घोर, देव की दीवाल घोर । आपकी घोर बिखेरता चल, पर की घोर बैठाता चल । वज्र का कीवाड़ जोड़ता चल, सार का कीवाड़ तोड़ता चल । कुण-कुण को बन्द करता चल-भूत को, पलीत को, देव को, दानव को, दुष्ट को, मुष्ठ को, चोट को, फेट को, मेले को, धरले को, उलके को, बुलके को, हिड़के को, भिड़के को, ओपरी को, पराई को, भूतनी को, डंकनी को, सियारी को, भूचरी को, खेचरी को, कलुवे को, मलवे को, उन को, मतवाय को, ताप को, पीड़ा को, साँस को, काँस को, मरे को, मुसाण को । कुण-कुण-सा मुसाण – काचिया मुसाण, भुकिया मुसाण, कीटिया मुसाण, चीड़ी चोपड़ा का मुसाण, नुहिया मुसाण – इन्हीं को बन्ध कर, ऐड़ो की ऐड़ी बन्द कर, जाँघ की जाड़ी बन्द कर, कटि की कड़ी बन्द कर, पेट की पीड़ा बन्द कर, छाती को शूल बन्द कर, सर की सीस बन्द कर, चोटी की चोटी बन्द कर । नौ नाड़ी, बहत्तर रोम-रोम में, घर-पिण्ड में दखल कर । देश बंगाल का मनसा राम सेबड़ा आकर मेरा काम सिद्ध न करे, तो गुरु उस्ताद से लाजे । शब्द सांचा, पिण्ड काचा, फुरो मन्त्र , ईश्वरो वाचा ।”

विधि व फलः-
रविवार के दिन सायं-काल भगवान् शिव के मन्दिर में जाकर सुगन्धित तेल का दीपक जलाकर लोबान-गूगल का धूप करें और नैवेद्य अर्पित करें । किसी धूणे या शिव-मन्दिर के साधु को गाँजे या तम्बाकू से भरी एक चिलम भेंट करें । तदुपरान्त मन्त्र का २७ बार जप करे । यह जप २७ दिनों तक नियमित रुप से करना चाहिए । फिर आवश्यकता पड़ने पर अर्थात् मन्त्र में वर्णित कोई रोग-बाधा दूर करने हेतु पीड़ित व्यक्ति को लोहे की छुरी या मोर-पंख से सात बार मन्त्र पढ़ते हुए झाड़ना चाहिए । इससे रोगी का रोग शान्त होता है । यह क्रिया तीन दिन तक प्रातः और सायं-काल करने से रोगी पूर्ण स्वस्थ हो जाता है ।
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संकट टालने का मन्त्र
संकट टालने का मन्त्र

मन्त्रः-
“जो प्रभु दीनदयाल कहावा ।
आरति हरन वेद जस गावा ।।
जपहिं नामु जन आरत भारी ।
मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी ।।
दीनदयाल बिरद सम्भारी ।
हरहु नाथ मम संकट भारी ।।”
मन्त्र की प्रयोग विधि और लाभः-
प्रभु राम की प्रतिमा के समक्ष लाल कम्बल के आसन पर बैठकर रात भर इस मन्त्र का नियमित जाप किया जाए, तो इस मन्त्र के प्रयोग से संकटादि का अन्त हो जाता है ।
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गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
Happy Republic Day
गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

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